3000 जवानों की घेराबंदी, बेटे की पुकार और एक करोड़ का इनाम, नक्सलियों का आखिरी कमांडर कौन?

3000 जवानों की घेराबंदी, बेटे की पुकार और एक करोड़ का इनाम, नक्सलियों का आखिरी कमांडर कौन?

3000 जवानों की घेराबंदी, बेटे की पुकार और एक करोड़ का इनाम, नक्सलियों का आखिरी कमांडर कौन?

नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन खत्म हो गई है। तमाम बड़े नक्सली कमांडरों ने हथियार डाल दिए हैं। वहीं, कुछ को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया है। अब नक्सलियों का सबसे आखिरी कमांडर बचा हुआ है, जिसके ऊपर एक करोड़ रुपए से अधिक का इनाम है।

उसका नाम मिसिर बेसरा है। सुरक्षाबलों को आशंका है कि मिसिर बेसरा झारंखड में छुपा हो सकता है। उसे ढूंढने के लिए सरांडा के जंगलों में तीन हजार सीआरपीएफ के जवान उतरे हैं। साथ ही उसके बेटे ने भी चिट्ठी लिखी है कि अब मुख्य धारा में लौट आएं।

परिवार से मिल रही है मदद

सुरक्षा बलों को इस ऑपरेशन में मिसिर बेसरा के परिवार से मदद मिली रही है। बेसरा के परिवार के लोग उससे अलग रहते हैं। उनसे कोई संपर्क भी नहीं है। मगर सुरक्षाबलों की मदद के लिए आगे आए हैं। साथ ही 60 की उम्र पार कर चुके बेसरा से वापस लौटने की अपील कर रहे हैं। सुरक्षा बलों के अनुसार मिसिर बेसरा अपने साथियों के साथ जंगल में छुपा हुआ है। अब परिवार ने उससे हथियार डालने की अपील की है। बेसरा के संगठन में कई नाम हैं। इनमें भास्कर, सुनील, सुनीर्मल और विवेक आदि हैं।

बेटे और भाई ने लिखी कई चिट्ठियां

परिवार का दावा है कि कई दशक से बेसरा से कोई संपर्क नहीं है। मिसिर बेसरा का बेटा का दक्षिण भारत में एक कैंटीन में काम करता है। उन्होंने नाम न सार्वजनिक करने की शर्त पर अपने पिता मिसिर बेसरा को कई चिट्ठियां लिखी है। बेटे के अलावे मिसिर बेसरा के छोटे भाई देवीलाल बेसरा ने भी चिट्ठी लिखी है।

अपनी पहचान बेटा नहीं बताना चाहता

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपार्ट के अनुसार मिसिर बेसरा के बेटे ने अपनी पहचान न उजागर करने की शर्त पर कहा कि सरकार अधिकारियों ने मुझसे कहा कि तुम्हारी चिट्ठी किसी तरह से मिसिर बेसरा तक पहुंच जाए। शायद इस इमोशनल अपील की वजह से वह मुख्यधारा में लौट आएं। बेटे ने कहा कि मैंने उन्हें लिखा कि हो सकता है कि मैं यह न समझ पाऊं कि उस समय वह नक्सली क्यों बने थे, लेकिन मैं यह जानता हूं कि अब सरेंडर करने से मना करना या सुरक्षाबलों से लड़ना गलत है।

1990 में आखिरी बार देखा था पिता का चेहरा

बेटे ने बताया कि मैंने आखिरी बार 1990 के दशक की शुरुआत में अपने पिता का चेहरा देखा था। उस समय मेरी उम्र पांच यह छह साल की रही होगी। अब उनकी धुंधली सी यादें, मेरे दादा जी उनसे मिलवाने के लिए जंगल ले गए थे। फिर उन्होंने हमें छोड़ दिया और नक्सली संगठन में शामिल हो गए। फिर मां ने भी छोड़ दिया। अब मैं अपनी पहचान जाहिर नहीं करना चाहता हूं, वह मेरी जिंदगी से हमेशा एक अदृश्य इंसान रहे हैं।

1980 में मिसिर बेसरा ने छोड़ दिया था घर

वहीं, मिसिर बेसरा के छोटे भाई देवीलाल बेसरा ने कहा कि वह 1980 के दशक के आखिर में गिरिडीह जिले में अपना घर छोड़ दिया था। इसके बाद कभी वापस नहीं लौटा। उन्होंने कहा कि वह धनबाद के पीके रॉय मेमोरियल कॉलेज में पढ़ रहा था, जहां से उसने ग्रेजुएशन पूरा किया। इसके बाद पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए एडमिनशन लिया। शायद वही पर उसकी नक्सलियों से मुलाकात हुई होगी।

3000 जवान कर रहे हैं उसकी तलाश

मिसिर बेसरा की तलाश में सीआरपीएफ कोबरा कमांडो की तीन बटालियनें झारखंड पहुंच चुकी हैं। बेसरा की तलाश में झारखंड एसटीएफ के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। सीआरपीएफ के एक अधिकारी ने कहा कि बेसरा को ओडिशा और छत्तीसगढ़ में घुसना मुश्किल है क्योंकि वहां उसकी मदद के लिए कोई कैडर नहीं है। हम जल्द ही उसे पकड़ लेंगे।